भारत में वृद्धजनों की स्थिति का समाजषास्त्रीय विष्लेषण ' प्रियंका दीक्षित
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सारांषः भारतीय सामाजिक संरचना का मूलाधार संयुक्त परिवार रहा है, जिसमें वृद्धजनों की सवोच्चता और प्रधानता पायी जाती थी। सामान्तया संयुक्त परिवार अपने प्रमुख (कत्र्ता) से संगठित रहता है और परम्परा के अनुसार इस पद पर परिवार का सबसे वृद्ध व्यक्ति अवस्थित होता था। उसी का निर्णय, अनुशासन एवं सुझाव आदि परिवार का विधान, व्यवहार एवं धर्म माना जाता था। वृद्ध भारतीय संस्कृति में एक आयु की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि लोक- धर्म है, जिसमंे श्रद्धा, विश्वास, आदर्श, मूल्य, मार्गदर्शक, पूज्य इत्यादि तत्त्वों का समावेश होता है। भारतीय शास्त्रों में एवं मनीषियों ने वृद्ध की सेवा को उद्धार एवं मोक्ष का एक साधन कहा है। यही कारण है कि, भारतीय समाज एवं संस्कृति में वृद्ध कभी समस्या नहीं रहे, बल्कि आदरणीय एवं पूज्य रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। ग्रामीण समाज में इसकी छवि आज भी देखी जा सकती है। किन्तु, वर्तमान में दर्पण का दूसरा पहलू भी उभरकर आया है, जो ग्रामीण भारत में वृद्धों की सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक चुनौतियों व समस्याओं की ओर हमारा ध्यानाकर्षण करा रहा है। इसके पृष्ठभूमि में औद्योगीकरण, नगरीकरण, पाश्चात्यीकरण, वैश्वीकरण, प्रतिस्पद्र्धात्मक जीवन, संचारीकरण, औपचारिक संस्थाओं की बहुलता, भौतिकवादी मूल्य इत्यादि प्रमुख कारक हैं। इन प्रक्रियाओं ने भारत में बुजुर्गों की प्रस्थिति में तेजी से बदलाव लाया है। प्रस्तुत शोधपत्र में इन्हीं बदलावों के सन्दर्भित द्वितीयक आंकड़ों के आधार पर वृद्धजनों की स्थिति का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया गया है।



