डिजिटल विभाजन और ग्रामीण स्वास्थ्य में कृत्रिम बौद्धिकता की भूमिका एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण - नेमा ओझा
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यह शोध पत्र भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा वितरण परकृत्रिम बौद्धिकता के दोहरे प्रभाव की गहन समाजशास्त्रीय जाँच प्रस्तुत करता है। द्वितीयक डेटा के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि कृत्रिम बौद्धिकता में पारंपरिक बाधाओं जैसे सीमित पहुँच और कुशल चिकित्सा पेशेवरों की कमी को दूर करने की अपार क्षमता है। हालांकि, इस क्षमता का कार्यान्वयन मौजूदा सामाजिक स्तरीकरण और असमानताओं कोडिजिटल विभाजन और कलन विधि पूर्वाग्रह के माध्यम से पुनरू प्रस्तुत कर सकता है। सैद्धांतिक रूपरेखा में, अभिनेता-नेटवर्क सिद्धांत का उपयोग कृत्रिम बौद्धिकता और डेटा को एक सक्रिय गैर-मानव अभिनेता के रूप में समझने के लिए किया गया है, जबकि फूकोवादी आलोचनासत्ता, मानकीकरण, और निगरानी के तंत्रों का विश्लेषण करती है। रिपोर्ट यह निष्कर्ष निकालती है कि केवल प्रौद्योगिकी समाधानों पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक-प्रौद्योगिकी विन्यास को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। समता-केंद्रित कृत्रिम बौद्धिकता शासन और विकेन्द्रीकृत ‘केंद्र एवं परिधि’ मॉडल के माध्यम से ही कृत्रिम बौद्धिकता की क्षमता का पूर्ण और न्यायसंगत लाभ उठाया जा सकता है, जिससे ग्रामीण समुदायों में स्वास्थ्य समता सुनिश्चित हो सके।



