भारत में प्राथमिक शिक्षा- एक मूल्यांकन- डाॅ0 मिन्नी कुमारी
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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्शन मण्डेला का विचार था कि, ‘‘शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं’’। शिक्षा मानव संसाधन विकसित करने का एक महत्वपूर्ण निवेश है। इस निवेश के माध्यम से किसी भी राष्ट्र के बहुमुखी विकास को गतिशील किया जा सकता है। यही कारण है कि, सम्पूर्ण विश्व ज्ञान की ओर अग्रसर है। इस दिशा में भारत ने कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये हैं और विगत 74 वर्षों में प्रगति के अनेक स्तरों को प्राप्त किया है। भारत की शिक्षा-व्यवस्था में मध्याह्न भोजन, ज़िला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम एस.एस.ए. आदि बड़े कदम हैं, जिन्होंने प्राथमिक शिक्षा को नवीन आयाम प्रदान किये हैं। इससे विभिन्न स्तरों पर विद्यालयों की संख्या में वृद्धि हुई है और कमजोर से कमजोर तबकों की विद्यालयों तक आसानी से पहुँच बन गयी है। यह तस्वीर का एक पहलू है, दूसरा पहलू उन लोगों से सम्बन्धित है जो अभी भी विद्यालयों से दूर, ग्रामीण-शहरी अंतराल की परिधि से बाहर, लैंगिक असमानता के शिकार, विद्यालय छोड़ने वाले बच्चे इत्यादि हैं। इसके सन्दर्भित प्राथमिक शिक्षा का स्वरूप, उनकी स्थिति, संस्थागत संरचना और विद्यालयीय शिक्षा के लिए विभिन्न नियामक निकायों की विवेचना प्रस्तुत अध्याय में किया गया है। भारतीय शिक्षा-प्रणाली के वर्तमान परिवेश में प्राथमिक शिक्षा, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा तथा उच्च प्राथमिक शिक्षा परस्पर सम्बद्ध हैं। अतः प्राथमिक शिक्षा के सांगोपांग विश्लेषण के लिए इन सबका समन्वित अध्ययन प्रस्तुत शोधपत्र में किया गया है।



