छायावाद के आधार स्तंभ कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
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छायावादी काव्यधारा के महाप्राण कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के समग्र काव्य, उनकी युगीन चेतना और साहित्यिक अवदान का एक विस्तृत विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। निराला का साहित्य केवल छायावादी कल्पनाविलास का प्रतिरूप नहीं है, बल्कि वह घोर सामाजिक यथार्थ, राष्ट्रीय अस्मिता, अद्वैत वेदांत और शोषित वर्ग के गहन सरोकारों से निर्मित हुआ है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में निराला की तत्समप्रधान शैली और कुछ आरंभिक कविताओं की क्लिष्टता की आलोचना की, परंतु वे निराला की बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा के कायल थे। शुक्ल जी ने स्वीकार किया कि निराला में संगीतात्मकता का अनूठा प्रवाह है और उनकी कल्पना अत्यंत प्रखर है। इस शोध के अंतर्गत निराला के काव्य में अंतर्निहित दार्शनिकता, वैयक्तिक दुख और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया गया है। साथ ही, हिंदी कविता को मुक्त छंद प्रदान करने में उनकी क्रांतिकारी भूमिका और भाषा-शिल्प के नव-प्रयोगों का आलोचनात्मक विवेचन किया गया है।



