श्रीअरविन्द के चिन्तन में 'समत्व' की संकल्पना- एक समाजषास्त्रीय अवलोकन- डाॅ0 उपेन्द्र कुमार सिंह
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प्रस्तुत शोधपत्र में श्रीअरविन्द का ‘समत्व’ पर चिन्तन दर्शन की समाजशास्त्रीय विवेचना किया गया है। श्रीअरविन्द ने गीता-प्रबन्ध के 19वें एवं 20वें आलेखों में इस पर सारगर्भित विचार व्यक्त किये हैं। उनका सारांश है कि, गीता में भगवान् ‘‘दिव्य कर्मी के लक्षणों का उपदेश करते हुए कहते हैं- वह ‘‘कर्तृत्वभिमान से परे’’, निष्कामता’’, आध्यात्मिक नैव्र्यक्तिकता’’, ‘‘समत्व’’, ‘‘पूर्ण आन्तर आनन्द और शान्ति’’ तथा ‘‘त्रैगुणातीत्य’’ होता है। इन लक्षणों का वर्तमान कर्म में उपस्थिति ही आत्मा में निहित असंख्य भेदों और विषमताओं के मध्य सबमें ‘‘सम-आत्मा के एकत्व’’ का अनुभव कर वह (आत्मा स्वरूप परमेश्वर) प्रकृति का रसपान करते हैं। इसीलिए गीता के कर्मयोग में ‘‘समत्व’’ का विशिष्ट स्थान है। समत्व ही ‘‘जगत् के साथ मुक्त आत्मा के मुक्त सम्बन्ध को मजबूत गाँठ से जोड़ती है।’’ श्रीअरविन्द के विचार में, ‘‘समत्व और ज्ञान’’ एक-दूसरे के पूरक हैं; अर्थात् दोनों ‘एकत्व’ में गँुथे हुए हैं। समत्व जहाँ प्रभु के कर्मों के प्रति पूर्ण समर्पण और लोकहित के निमित्त मात्र है, वहीं इस सूक्ष्म ज्ञान से ही समत्व सम्भव है।



