रामदरश मिश्र की आलोचना दृष्टि * घनश्याम चौहान
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डॉ० रामदरश मिश्र जी की गिनती सर्वाधिक ग्राह्य एवं पठनीय रचनाकारों में होती है, उनकी रचनाओं में सतत सार्वभौमकि दृष्टि समाहित है। मिश्र जी ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने अपने लेखन को पहले जिया फिर कलमबद्ध किया। इनकी रचनाएँ मात्र किलिष्ट वाग्जाल न होकर मन के भीतर से निर्झर की भांति निःसृत होती है। कविता लेखन से शुरु हई उनकी सहज संवेदी सृजनात्मकता ने हिन्दी साहित्य की लगभग सभी विधाओं को गहराई से स्पर्श किया है। मिश्र जी ने आलोचना के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य को नई दिशा दी है। उन्होंने हिन्दी उपन्यासः एक अंतर्यात्रा, हिन्दी कहानीः अन्तरंग पहचान और हिन्दी कविताः आधुनिक आयाम जैसी कृतियों के माध्यम से हिन्दी साहित्य की प्रवृतियों उसके रूपान्तरण और वैचारिक विकास का विश्लेषण किया है। मिश्र जी की आलोचना में कठोरता नहीं बल्कि सहानुभूति और समझ है। इस संबंध वे स्वयं लिखते हैं कि, "जब कोई बड़ी सृजनशील प्रतिभा समालोचना में हाथ डालती है, तब उसके लिए केवल यही संभव होता है कि वह समालोचना को ही सृजनात्मक कर्म बना दे। मिश्र जी साहित्य को जीवन से जोड़कर देखते है। वे स्वयं को मूलतः एक सर्जक मानते हैं। उनकी आलोचना में रचनात्मकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। नाटक को छोड़कर हिन्दी साहित्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं की प्रवृत्तियों और रचनाओं का उन्होंने गहन मूल्यांकन किया है। उनकी आलोचना साहित्य की सही समझ को विकसित करने का प्रयास करती है। वह न तो विचारों और शब्दों के जटिल जाल में उलझती है और न ही पाठक को उलझाती है. बल्कि रचनाओं से रचनात्मक संवाद स्थापित करते हुए पाठक और कृति के बीच सेतु का कार्य करती है।



