महाभारत में विवेचित आचार मीमांसा- श्रीमती संध्या गिरि, प्रो0 (डा0) विवेक पाण्डेय
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महाभारत में शान्तिपर्व के मोक्ष धर्म उपपर्व के 188 एवं 189 वें अध्याय में वर्णों की उत्पत्ति एवं उनके कार्यों का वर्णन प्राप्त होता है। 188वें अध्याय में भृगु जी कहते है कि हे भरद्वाज ब्रहमा जी ने सृष्टि के प्रारम्भ में अपने तेज से सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले ब्राम्हणों, मरीचि आदि प्रजापतियों को ही उत्पन्न किया। उसके बाद स्वर्ग प्राप्ति के साधनभूत सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद आचार और शौच के नियम बनाये। तदनन्तर देवता, दानव, गन्धर्व, दैत्य असुर, सर्प, यक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच और मनुष्यों को उत्पन्न किया और उसके बाद उन्होंने ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों की रचना की और प्राणि समूहों में जो अन्य समुदाय हैं उनकी भी सृष्टि की ब्राहमणानां सितो वर्णः क्षत्रियाणां तु लोहितः। वैश्यानां पीतको वर्णः शूद्राणामसितस्तथा।। ब्राहमणः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम। ये चान्ये भूत संघानां संघास्तांश्चापि निर्ममे।।



