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पारिवारिक महिलाओं की आर्थिक परिप्रेक्ष्य में समाजशास्त्रीय विवेचना डॉ० दीपेन्द्र मोहन सिंह

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Zenodo2026-01-12 更新2026-05-26 收录
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सारांशः सामाजिक संस्थाओं में परिवार सर्वप्रथम प्राथमिक संस्था है। मानव इसी में जन्म लेता है और जीवन जीवन सम्बन्धी प्राथमिक सबक उसे यहीं से मिलना आरम्भ होता है। इसीलिए परिवार को व्यक्ति की प्राथमिक पाठशाला कहा जाता है। परिवार व्यक्ति के सुरक्षा का सबसे अधिक सुरक्षित स्थान होता है। परिवार के सदस्यों का जीवन एवं स्वार्थ स्वयं के लिए न होकर सभी सदस्यों के साथ जुड़ा होता है। यह एक सार्वभौम संस्था है। श्यामाचरण दूबे लिखते हैं कि, "मानव की समस्त सामाजिक संस्थाओं में परिवार एक आधारभूत और सर्वव्यापी सामाजिक संस्था है। संस्कृति के सभी स्तरों में चाहें उन्हें उन्नत कहा जाय या निम्न किसी-न-किसी प्रकार का पारिवारिक संगठन अनिवार्यतः पाया जाता है।"" वास्तव में, परिवार व्यवस्थित सामाजिक जीवन की प्रथम इकाई है और समाज रूपी भवन के कोने का पत्थर (Corner stone of society)। परिवार यौन सन्तुष्टियों का नियमन करता है, सन्तान के जनन एवं पालन-पोषण की व्यवस्था करता है, भावनात्मक घनिष्टता का मूर्तरूप है, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक-सांस्कृतिक-धार्मिक शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, इत्यादि। अपनी सन्तान के रूप में मानव सदैव जीवित रहता है। यदि यह कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि, मानव के पास जो कुछ सुन्दर है, वह परिवार द्वारा सुरक्षित रखने से ही है। भारतीय परिवार में महिलाएँः भारतीय सामाजिक संगठन के मूलाधारों में संयुक्त परिवार' भी सम्मिलित है। आई० पी० देसाई के मत में, "भारतीयों के लिए परिवार का वही अर्थ है जो अंग्रेजी के Jaint Family से लिया जाता है, नाभिक परिवार भारतीय अवधारणा नहीं है। इसे डेविड जी० मण्डेलबाउम के मत में, "भारत में परिवार का शास्त्रीय स्वरूप संयुक्त रहा है। ऐसा हिन्दुओं की कुछ पवित्र पुस्तकों में उल्लिखित है तथा सदियों पुरानी इस भूमि पर यह स्वरूप प्रचलित रहा है।" मैक्स मूलर ने तो संयुक्त परिवार को "भारत की आदि परम्परा" का नाम दिया है। संयुक्त परिवार को अनेक विद्वानों ने स्पष्ट किया है। आई० कार्वे का विचार है कि, "एक संयुक्त परिवार ऐसे व्यक्तियों का एक समूह है जो सामान्यतया एक ही घर में रहते हैं, जो एक ही रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सम्पत्ति के सम्मिलित स्वामी होते हैं, तथा जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं और जो किसी-न-किसी प्रकार से एक-दूसरे के रक्त सम्बन्धी हों।"" आई० पी० देसाई का विचार है कि, "हम उस गृह को संयुक्त परिवार कहते हैं, जिसमें एकाकी परिवार से अधि एक पीढ़ियों (अर्थात् तीन या अधिक) के सदस्य रहते हैं और जिसके सदस्य एक-दूसरे से सम्पत्ति, आय और पारस्परिक अधिकारों तथा कर्त्तव्यों द्वारा सम्बद्ध हों।"s डॉ० दुबे के अनुसार, "यदि कई मूल परिवार एक साथ रहते हों और उनमें निकट का नाता हो तो उन्हें उनके सम्मिलित रूप में संयुक्त परिवार कहा जा सकता है।"* संक्षेप में, संयुक्त परिवार में दो से अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही रसोई का भोजन करते हैं, इनकी सम्पत्ति सामूहिक होती हैं तथा विभिन्न त्यौहारों व उत्सवों एवं धर्म-कार्य को साथ-साथ (सामूहिक रूप से) सम्पन्न करने में सहभागी बनते हैं तथा सदस्य परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध 'हम की भावना से जुड़े होते हैं। इस दृष्टि से परिवार व्यक्ति का सबसे बड़ा हितैशी और विकास में सहायक होता है। अतः प्रस्तुत अध्ययन में महिलाओं के प्रस्थिति परिवर्तन में परिवार की भूमिका का अध्ययन प्राथमिक तथ्यों के आधार पर किया गया है।

创建时间:
2026-01-12
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