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निराला साहित्य की भाषिक योजना *संतोष कुमार मिश्र ** डॉ० सीमा सिंह

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Zenodo2026-01-12 更新2026-05-26 收录
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सारांशः निराला साहित्य में गहरा भाषिक अतर्द्वन्द परिलक्षित होता है। उन्होंने भाषा के हर स्तर को अपने लिए सहज, सुलभ बनाने का हर सम्भव प्रयास किया। रचनाकार ने भाषा को अनुभूति से जोड़ते हुए शब्दों को अर्थ की आत्मा के स्तर तक तादात्म्य को स्थापित करने का अनूठा प्रयास किया। निराला जी ने भाषा के नवीन प्रयोग एवं वैविध्य के बल पर एक नयी तरीके की मौलिक अर्थव्यन्जना को जन्म दिया तथा एक ही साथ एवं एक ही स्तर पर बहुत सारी भाषाओं के प्रयोग को आत्मसात कर सके। भाषा के महत्व, चारुता एवं उपयोगिता के प्रति जो व्यापक उत्सुकता एवं लगन निराला जी के भाषिक विधान में देखने को मिलती है वह अन्य एवं परवर्ती कवियों में देखने को नहीं मिलती है। निराला जी शब्दों की सम्पूर्ण योजना को अपनी संवेदना के साथ तादात्म्य को स्थापित करते हुए साहित्य जगत में बलपूर्वक, आग्रहपूर्वक उतार लाते है। निराला जी के भाषिक पक्ष का सबसे बड़ा बल है भावानुकूल एवं प्रसंगानुकूल भाषा का सुंदर प्रयोग रचना की महत्ता को बढ़ाने का काम करती है। भाव के अनुसार लय एवं भाषा का प्रयोग करने वाले निराला प्रचण्ड प्राणशक्ति से समन्वित, दुर्दम जिजीविषा से युक्त सूक्ष्म संवेदना को धारित करने वाले कवि हैं। सृष्टि और मनुष्य के तट तक जाकर व्यापक भाव ग्रहण करते हैं। तथा अपनी महत्वपूर्ण कविता भिक्षुक, विधवा, तोड़ती पत्थर, दीन, दान जैसी रचनाओं द्वारा अपनी भावों को व्यक्त करते हैं। निराला जी संवेदना के जिस स्तर से भाषा को जोड़कर साहित्य क्षेत्र में प्रवृत्त होते हैं, उसके माध्यम से मानवीय अस्तित्व की सघनता एवं जटिलता को देखा जा सकता है। यह भाषिक विधान की गहराई का ही प्रतिफल है कि जितने आवर्त एवं परत निराला जी के काव्य फलक में देखे जा सकते है उतने अन्य छायावादी कवियों में नही देखे जा सकते हैं। यही कारण है कि उनकी काव्यभाषा का स्वरूप

创建时间:
2026-01-12
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