महात्मा बुद्ध की षिक्षाओं से सामाजिक समरसता के नवीन युग का प्रादुर्भाव- डा0 महात्मा प्रणव कुमार चतुर्वेदी
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महात्मा बुद्ध अपनी शिक्षाओं के माध्यम से नए युग का आगाज किया। इसे उद्घाटित करते हुए प्रो0 आंगने लाल (अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार, सारनाथ) कहते है कि, ‘बौद्ध धर्म और सामाजिक न्याय, एक ही समाज रूपी सिक्के के दो पहूल है।’ सामाजिक न्याय एवं समरसता और महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। महात्मा बुद्ध ने मानवमात्र की एकता, सौहार्द, स्वतंत्रता, समता, न्याय को अपनी शिक्षाओं का आधार बनाया। यह बात उनकी शिक्षाओं से भी स्पष्ट है- सारनाथ में मूलगन्ध कुटी विहार के समीप स्थित ‘धर्म राजिका स्तूप’ के अवशेष पर तथागत ने पंच वर्गीय भिक्षुओं से प्रश्नोत्तर शैली में कहा था, ‘‘मेरे धर्म का केन्द्र बिन्दु न आत्मा है और न परमात्मा है। कर्मकाण्डों से भी मेरा कुछ लेना-देना नहीं। मेरी शिक्षाओं का केन्द्र बिन्दु है- आदमी और इस पृथ्वी पर रहते उसका अन्य आदमी के प्रति क्या कर्तव्य?, है।" आगे अंकित है- ‘‘संसार का प्रत्येक आदमी दुःखी है। संसार दुःख का घर है। मेरी वैचारिकी का ध्येय इस दुःख का नाश करना है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।" भारत में सामाजिक समरसता वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा से उत्सर्जित है, जिसके अनुसार शूद्र और नारी का मनमाने ढंग से शोषण और दलन किया गया। इसी कारण एक शोषित या दलित वर्ग, तो दूसरा इनका शोषण करने वाला सम्भ्रांत वर्ग (उच्च वर्ण/जाति) बना। दलित वर्ग इतना कुचल दिया गया था कि उसे अपनी पतनावस्था का एहसास भी नहीं रह गया। ऐसे आदमियों के लिये ही प्रेरणा स्रोत महामानव बुद्ध ने कहा था कि, आदमी अपने स्तर से नीचे गिर जाय, यह बहुत दुःख की बात नहीं है, बल्कि दुःख तो इसकी है कि उसे नीचे गिरने का एहसास तक न हो। ऐसे उद्गार से बुद्ध ने दलित को उसकी पतितावस्था का एहसास ही नहीं कराया, बल्कि उसके उद्धार हेतु सूत्र प्रदान किया और उसे व्यवहार में मूर्त कर दिखा दिया।



