श्रीअरविन्द के 'समग्र षिक्षा' दर्षन का युवा-निर्माण में भूमिका - राजेश कुमार बरनवाल, डाॅ0 गौतम आनन्द सिंह
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21वीं सदी में सामाजिक, तकनीकी और सांस्कृतिक बदलाव तेजी से हो रहे हैं। इन बदलावों ने शिक्षा की भूमिका और पढ़ाने के उन तरीकों को सही ठहराने पर बहस छेड़ दी है जो इंसान के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देते हैं। यहाँ, श्रीअरविंदो का शिक्षा दर्शन, शिक्षा को ‘समग्र आत्म-विकास’ की प्रक्रिया के रूप में समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। प्रस्तुत शोध-पत्र श्रीअरविंदो द्वारा ‘समग्र शिक्षा’ (प्दजमहतंस म्कनबंजपवद) के संदर्भ में प्रस्तुत आत्म-विकास की अवधारणा के अन्वेषण से सम्बद्ध है, जिसकी आधुनिक शिक्षण कार्यों में उपयोगिता के विमर्श को आगे बढ़ाने पर बल प्रदान करता है। अध्ययन श्रीअरविंदो की रचनाओं और समग्र शिक्षा व परिवर्तनकारी सीखने (जतंदेवितउंजपअम समंतदपदह) के आधुनिक सिद्धांतों की दार्शनिक और व्याख्यात्मक समीक्षा पर आधारित गुणात्मक वैचारिक शोध-प्रारूप पर निर्भर करता है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि, श्रीअरविंदो का शिक्षा दर्शन सीखने वाले के शारीरिक, प्राणिक (अपजंस), मानसिक, आत्मिक (चेलबीपब), और आध्यात्मिक पहलुओं के समग्र विकास पर जोर देता है। यह एक बहुआयामी शिक्षा मॉडल को बढ़ावा देता है जो पारंपरिक संज्ञानात्मक और उपयोगितावादी शिक्षा मॉडलों से कहीं आगे जाता है। श्रीअरविंदो का दर्शन 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण शैक्षिक मुद्दों- सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा, नैतिक विकास, सीखने की सक्रिय भूमिका (समंतदमत ंहमदबल) और मूल्य-आधारित शिक्षा, से निपटने के लिए एक उपयोगी आदर्श आधार है। श्रीअरविंदो के विचारों को पाठ्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण और शिक्षण विधियों के ढांचे में शामिल किया जा सकता है ताकि अधिक समग्र और परिवर्तनकारी शिक्षण मॉडलों को बढ़ावा दिया जा सके। प्रस्तुत शोधपत्र शिक्षा को इस तरह की शैक्षणिक बहसों में योगदान देता है, जो पारंपरिक भारतीय शिक्षण-पद्धति के विचारों और समकालीन शिक्षण-पद्धति की चर्चा के मध्य संबंध स्थापित करके बौद्धिक क्षमता, नैतिक जागरूकता और आंतरिक विकास को बढ़ावा दे।



