21वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में किन्नर समुदाय की उपस्थिति - प्रो0 जैनेन्द्र कुमार पाण्डेय
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21 वीं सदी के तेजी से बदलते परिवेश में तकनीक के साथ-साथ व्यक्ति, समाज और साहित्य के स्वर मे भी व्यापक बदलाव परिलक्षित हो रहा है। हिन्दी कथा साहित्य, विशेषकर उपन्यास अपने समय और समाज की बदलती स्थिति को बहुत संजीदगी के साथ अपने भीतर दर्ज कर रहा है। इस दौर के उपन्यास अपने समय के महत्त्वपूर्ण सवालों से लगातार बावस्ता हो रहे हैं। इनकी खासियत यह भी है कि ये समय के जटिल सवालों को न केवल उठा रहे हैं, बल्कि उनके प्रति पाठकों को भी लगातार संवेदनशील बना रहे हैं। सामयिक सवालों पर अंतर्वस्तु को केंद्रित करना आज के उपन्यासों की जानी-पहचानी खासियत हो गई है। ऐसा लग रहा, जैसे सामयिक सवाल आज के उपन्यासकार की संवेदना तथा उसके सोच को लगातार मथ रहे हों। वह इन सवालों से बेचैन हो रहा है और उन्हें निरंतर विमर्श के केंद्र में ला भी रहा है। इसका प्रमाण आज वे उपन्यास हैं जो लगातार हाशिये के समाज के दुख- तकलीफ और सपनों को अभिव्यक्त कर रहे हैं। इस संदर्भ में थर्ड जेंडर या किन्नर जैसे उपेक्षित समुदाय की हिन्दी उपन्यासों में उपस्थिति एक महत्त्वपूर्ण पहल के तौर पर देखी जा सकती है। आज का उपन्यासकार अपने उपन्यासों के जरिए इस समुदाय से न सिर्फ संवाद स्थापित कर रहा है, अपितु उनकी आवाज को भी व्यापक फलक प्रदान कर रहा है। इस दृष्टि से वह उपेक्षित समुदाय का सही मायने में प्रतिनिधित्व कर रहा है। कहना न होगा कि किन्नर समुदाय उपेक्षित समुदाय में भी सर्वाधिक उपेक्षित है। हमारे समाज का दायित्व है कि वह किन्नर समुदाय की पीड़ा समझे, उसके प्रति संवेदना रखे और उसे बराबरी का दर्जा देते हुए उसे मनुष्य के रूप में अंगीकार करे। परंतु दुर्भाग्यवश अभी तक ऐसा हुआ नहीं है। इतना तो हुआ है कि इस संवेदनशील विषय की ओर 21 वीं सदी के कुछ हिन्दी उपन्यासकारों ने अपनी दृष्टि अवश्य दौड़ायी है, जिसे अच्छा संकेत माना जा सकता है। उन्होंने इस समुदाय की पीड़ा को न केवल समझा है, बल्कि उसके प्रति अपनी संवेदना भी जतायी है। प्रस्तुत शोधपत्र में वर्तमान जीवन की विभिन्न समस्याओं के साथ किन्नर समुदाय की अस्मिता का गहरा रेखांकन किया गया है। साथ ही, उन उपन्यासकारों की दृष्टि एवं विचारों का भी विश्लेषण किया गया है, जिन्होंने इस ज्वलंत विषय पर अपनी लेखनी चलायी है।



