भारतवर्ष में पंचायत- एक विष्लेषणात्मक अध्ययन -संजय कुमार मिश्र
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भारतवर्ष के सामाजिक-राजनीतिक मूलाधारों में ‘‘पंचायत'' का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहाँ पंचायतों के ‘‘पंच'' को ‘‘परमेश्वर'' का दर्जा प्रदान किए जाने की परम्परा रही है। यद्यपि प्राचीन कालीन पंचायतों का कोई ‘‘औपचारिक स्वरूप'’नहीं था, किन्तु इसकी प्रभाविकता किसी भी वर्तमान राजकीय न्यायालय से कम नहीं था। भारत की पंचायतें न्याय-व्यवस्था एवं सामाजिक संगठन की रीढ़ थीं। समय के प्रवाह में समाज की अनेक संस्थाओं में बदलाव आता गया तथा हमारे राजनीतिक सम्बन्धों में भी मौलिक परिवर्तन आया, जिससे पंचायत भी प्रभावित हुईं। पंचायतों में अनौपचारिक बदलाव स्वतंत्र भारत के संविधान में मूर्त रूप तब धारण किया, जब ‘‘नीति निर्देशक सिद्धान्तों'' में अनुच्छेद 40 एवं राज्य सूची के अन्तर्गत राज्यों को पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया। महात्मा गाँधी के जनम दिवस 02 अक्टूबर, 1952 को पं0 जवाहर लाल नेहरू, प्रधानमंत्री, भारत सरकार द्वारा पंचायती राज एवं सामुदायिक विकास मंत्रालय के तत्वाधान में ‘‘सामुदायिक विकास कार्यक्रमों'' का प्रारम्भ किया गया। साथ ही, पंचायती राज्य को वैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिये कई आयोगों का गठन किया गया। आयोगों के अध्ययन रिपोर्टों, जन-मानस के विचारों तथा सदनीय विमर्श के पश्चात् सन् 1992 में ‘‘पंचायती राज (73वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम'' संसद द्वारा पारित हुआ तथा राष्ट्रपति के हस्ताक्षरोपरांत सन् 1993 से सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रभावी हो गया। इसी के साथ नगर निकायों में पंचायती राज को लागू करने के लिए ‘‘पंचायती राज (74वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम, 1994’’ पारित किया गया। इस तरह ग्रामीण एवं नगरीय परिक्षेत्रों में पंचायती राज अपने वैधानिक शक्तियों के साथ अस्तित्व में आ गया।



