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गोविन्द मिश्र के उपन्यासों का चरित्र-शिल्प- रवि कुमार, प्रो0 (डा0) तारकेश्वर पण्डित

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Zenodo2026-02-10 更新2026-05-26 收录
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उपन्यास रचना के दृष्टिगत शिल्प वण्र्यवस्तु के अनुरूप पात्रों की योजना की प्रस्तुति है, जिसकी अभिव्यक्ति रचनाकार कौशल लेखनी द्वारा करता है। किसी भी रचना में चरित्र-शिल्प तत्त्व अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। उपन्यासकार अपनी कथा-वस्तु के अनुरूप पात्रों का चयन करके उनकी रूप-सज्जा, स्वभाव, मनोदशा और वैचारिकी इत्यादि पर कलम चलाता है, जिससे रचना कथा-वस्तु जीवन्त एवं सजीव लगे। इसी के अनुरूप उपन्यासकार अपने पात्रों के क्रियाकलाप, विचार, आचरण एवं व्यवहार आदि का भी सृजन करता है। चरित्र-शिल्प इस तरह की होनी चाहिए, जिससे पाठकों को लगे कि, चरित्र उसी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वस्तुतः औपन्यासिक कथा-संसार के मुख्य नियामक पात्र और उसकी साज-सज्जा के शिल्प में ही उसकी सफलता-विफलता की कहानी स्वभावतः समाहित हो जाता है। चरित्रों से ही उपन्यास के कथा-संसार का निर्माण होता है। इसीलिए उसके पात्रों का चयन, उनकी सजीवता और उनके माध्यम से मानवीय अनुभूतियों, संवेदनाओं और जीवन-यथार्थता की अभिव्यक्ति ही उपन्यासकार का अभीष्ट ध्येय होता है। उपन्यास को मानव-जीवन की महागाथा कहा जाता है, जिसमें उसके चरित्र-शिल्प की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

创建时间:
2026-02-10
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