समाजशास्त्रीय खेल सिद्धांत- एक विवेचना- प्रो0 ज्ञानेन्द्र सिंह
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समाजशास्त्रीय खेखेल सिद्धांत को मल्टी-एजेंट मॉडलिंग में एक अहम योगदान के तौर पर देखते हैं, जिसका इस्तेमाल अर्थशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। प्रस्तुत शोधपत्र क्लासिकल (शास्त्रीय) खेल सिद्धांत को आगे बढ़ाने या उसका समाजशास्त्रीयकरण करने, के दो अलग-अलग तरीके पेश करता है- पहला, एक सिस्टम-संस्थागत तरीका, सोशल साइंस खेल सिद्धांत (ैळज्), और दूसरा, इरविंग गोफमैन का अन्तक्र्रियावादी तरीका (प्.गेम थ्योरी)। इन दोनों तरीकों को पेश किया गया है और उनकी तुलना की गई है। साथ ही, क्लासिकल थ्योरी से भी इनका अंतर बताया गया है। इस बारे में निष्कर्ष प्रतिपादित है कि, सोशल साइंस खेल सिद्धांत की वजह से, समाजशास्त्री और सामाजिक वैज्ञानिक अब क्लासिकल थ्योरी के उस दायरे में बंधे रहने को मजबूर नहीं हैं, जिसमें बहुत अधिक तर्कसंगतता, बिना सामाजिक जुड़ाव वाले खिलाड़ी (और किसी भी तरह के सामाजिक ताने-बाने, संस्थागत और सांस्कृतिक संरचनाओं) की कमी होती थी। इसके अलावा, नई खेल सिद्धांत सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं और तरीकों का एक भरोसेमंद टूलकिट देती है, जिससे बहुत अलग-अलग तरह की अन्तक्र्रिया प्रक्रियाओं का वर्णन, विश्लेषण और व्याख्या की जा सकती है। ये दोनों तरीके सहयोग, टकराव और बातचीत जैसी कई तरह की अन्तक्र्रिया प्रक्रियाओं की जांच के लिए उपयोगी साबित हो चुकी हैं।ल सिद्धांत- एक विवेचना ’ प्रो0 ज्ञानेन्द्र सिंह



