गोविन्द मिश्र का कृतित्व एक अवलोकन * रवि कुमार, ** प्रो० (डॉ०) तारकेश्वर पण्डित
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गोविंद मिश्र हिन्दी साहित्य जगत के प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों में शुमार किये जाते हैं। मिश्र जी सन् 1963 से वे सतत् साहित्य सृजन में तल्लीन हैं, जिसके फलस्वरूप आपके 11 उपन्यास, 20 कहानी संग्रह, 6 यात्रा वृत्तांत, 8 निबंध, 4 बाल साहित्य, 2 आलोचनात्मक ग्रंथ, तथा 6 पाठकों के मध्य आ चुके हैं। मिश्र की इन्हीं रचनाओं ने समकालीन हिन्दी कथा-साहित्यकारों में उनकी एक विशिष्ट परिचय स्थापित कर दी है। गोविंद मिश्र अपने कलम से बहु-आयामी कृतियों का सृजन किया है, जिनमें भारतीय समाज के परिवर्तित परिदृश्य सारगर्भित एवं स्पष्ट चित्रण देखा जा सकता है। आपके साहित्य में पारिवारिक जीवन, स्त्री-पुरूष संबंधों की यथार्थता, बिखरते परिवार एवं मनुष्य, मानवीय में अवमूल्यन, अंतरंगता की ललक, मध्यवर्गीय चेतना, आधुनिक नारी, शहर एवं कस्बे के सांस्तिक तनाव, बिखराव, छटपटाती नैतिकता, मानवीय गर्माहट का अन्वेषण, स्वप्न भंग, शासनतंत्र के तिलिस्म को सार्वजनिक करना इत्यादि मुद्दों को मिश्र जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से यथार्थता के धरातल पर ला खड़ा किया है।'



