चित्रा मुद्गल के 'आवां' उपन्यास में व्यक्त नारी जीवन संघर्ष *अमित पटेल
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समकालीन स्त्री कथा लेखन परम्परा में चित्रा मुगल का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। चित्रा मुद्गल जी उस धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं जो समाज में महिला की दोयम स्थिति को समाप्त करने के साथ साथ महिलाओं को उनके उत्तरदायित्यों के प्रति सजग भी कराती हैं। मुद्गल जी के कथा साहित्य का प्रमुख स्वर 'नारी संघर्ष है तथा इसके मूल में नारी मुक्ति है। उनका यह नारी संघर्ष स्त्री को सामाजिक परिवेश में दुय्यम स्थान से मुक्त कराकर समाज में पुरुषों के बराबर हर क्षेत्र में स्थान दिलाने के लिए प्रयत्नशील है। परन्तु चित्रा मुद्गल जी उनके संघर्ष में नारी के अधिकारों के साथ-साथ उनके कर्तव्यों की भी चर्चा की हैं। मुद्गल जी एक स्वस्थ नारीवाद से प्रेरित समन्वयवादी लेखिका हैं। इनके कथा साहित्य में एक और नारी अपने अस्तित्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए पुरुष प्रधान समाज से संघर्ष कर रही है वहीं दूसरी ओर फैले अन्याय, अत्याचार, शोषण अमानवियता आदि का विरोध करती दिखाई देती है।



