स्वतंत्र भारत मंे अनुसूचित जातियों की षैक्षिक-स्थिति एवं कार्यक्रम -कृष्णानन्द पाण्डेय
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आजादी के बाद भारत में हुए शैक्षिक विकास पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है, कि हमने शिक्षा के सभी क्षेत्रों में उत्तरोत्तर विकास किया है। किन्तु, हम सुनिश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति में पूर्णतया सफलता अर्जित नहीं कर पाये हैं। भारत सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में अनेकानेक समितियों एवं आयोगों का गठन किया गया, जिन्होंने बहुत चर्चा के पश्चात् अनेक अनुसंशाएँ (सिफारिशें) भी की। इन सभी अनुसंशाओं पर आधारित एक‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986’ में बनाई गई। तत्पश्चात् एक कार्यक्रम क्रियान्वयन दस्तावेज (1992) भी निर्मित किया गया, जिसमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सुझाएँ गये लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लघुकालिक, मध्यकालिक एवं दीर्घकालिक उपायों की चर्चा की गई। विचारोपरांत कई शैक्षिक कार्यक्रम एवं परियोजनाएँ राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर लागू किये गये, जिसमें लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में किये गये प्रयासों को भी ध्यान में रखा गया। प्राथमिक स्तर पर जिला प्राथमिक शिक्षा परियोजना (डी.पी.ई.पी.), शिक्षाकर्मी योजना, बेसिक शिक्षा योजना, बिहार शिक्षा परियोजना (बी.ई.पी.), लोकजुम्बिश, अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम, शिक्षा गारंटी योजना, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, सर्वशिक्षा अभियान (एस.एस.ए.) लागू किये गये हैं। इन योजनाओं के कुछ निर्धारित लक्ष्य और उनकी कुछ विशिष्ट विशेषताएँ थीं। पंचवर्षीय योजनाओं में प्राप्त उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए पुनः लक्ष्य निर्धारित किये गये तथा उसमें वांछनीय संसाधनों को मुहैया कराने का प्रावधान भी किया गया। इसके बाद भी आज अनेकानेक चनौतियाँ हैं, जिसमें बच्चों का विद्यालय में नामांकन, विद्यालय प्रतिधारण एवं गुणात्मक शिक्षा प्रदान करना इत्यादि प्रमुख हैं। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चे भी विद्यालय में लगभग उनकी आबादी के अनुसार प्रवेश तो ले चुके हैं, लेकिन बहुत से बच्चे उच्च प्राथमिक स्तर तक पहुचँते-पहुँचते विद्यालय छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चों को दुबारा विद्यालय में लाने का प्रयास भी शिक्षक एवं राज्य द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए देश में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की आवश्यकता महसूस की गई। फलस्वरूप संसद द्वारा 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' पारित कर लागू किया गया। इस कानून के प्रभाव में आने के बाद शिक्षा एक मौलिक अधिकार बन गया है। किन्तु, कानून के प्रावधानों की प्राप्ति में प्रत्येक स्तर पर सम्यक् भूमिकाओं एवं उत्तरदायित्वों का उल्लेघ्ख भी किया गया है। वर्तमान में भारत राष्ट्रीय स्तर पर माध्यमिक शिक्षा की सार्वभौमिक लक्ष्य प्रापित की ओर तेजी से बढ़ा हैं, लेकिन अनुसूचित जाति की प्रारंभिक स्तर पर आने वाली शैक्षिक समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इस दिशा में गहन चिन्तन कर कदम उठाने की आवश्यकता है।



