अधिगम आदत को प्रभावित करने वाले कारक- एक विवेचना- डा0 लालमणि प्रजापति
收藏资源简介:
सामान्य धारणा के अनुसार, शिक्षा शिक्षार्थियों के अन्तःस्थ क्षमताओं को उद्घाटित कर उसके व्यक्तित्व परिष्कार में अपूर्व योगदान देता है। इस रूप में एक शिक्षार्थी समाज का परिपक्व सदस्य बनकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को कुशलतापूर्वक सम्पन्न करने की दिशा में अग्रसर होता है। इस दृष्टि से शिक्षा ज्ञान तथा कौशलों को सम्पन्न करने की प्रक्रिया से सम्बद्ध है। वास्तव में, शिक्षा सतत् उन्नति की ओर विकासनशील प्रक्रिया है, जो व्यक्ति के समग्र जीवन एवं समस्त आयामों के सर्वांगीण विकास की ओर अग्रसर होता है। शिक्षा मानव के उत्पत्ति से लेकर मृत्युपर्यंत चलने वाली आजीवन प्रक्रिया है, जो मानव को विविध संस्कारों से परिपूर्ण करते हुए निर्वाण प्राप्ति में सहायक होता है। एक शिक्षाकांक्षी व्यक्ति अपने जीवन काल में हरेक पल एवं परिस्थितियों में सिखता रहता है। इसीलिए कहा जाता है- ‘‘ज्ञानं मनुजस्य तृतीय नेत्रं’’। मनुष्य जीवन में शिक्षा की सकारात्मक भूमिका के दृष्टिगत यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि, ‘इसके द्वारा एक शिक्षार्थी अमानवीय दुर्गुणों से मुक्त होकर मानवीय सद्गुणों एवं सद्वृत्तियों से अभिसिंचित होता है। इसी से उसमें अच्छे संवेग, अच्छी वृत्ति, अच्छी भावना, उच्च आदर्श आदि सकारात्मक गुणों का प्रस्फुटन हो पाता है। यह भी ध्यातव्य है कि, सृष्टि के सभी जीवधारियों में सीखने की सर्वाधिक क्षमता एवं कुशलता मानव मंे पायी जाती है। ‘‘किसी समाज में सदैव चलने वाली सीखने-सीखाने की सप्रयोज्य प्रक्रिया ही शिक्षा है।’’ प्रस्तुत शोधपत्र में इसी तथ्य के उद्घाटन हेतु ‘अधिगम आदत’ को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण किया गया है।



