राजनीति और राजनीति विज्ञान की संकल्पनात्मक विवेचना- प्रो. प्रेमचन्द्र यादव
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ाजनीति अध्ययन का एक प्राचीन विषय है, तो वहीं राजनीति का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला राजनीति विज्ञान अपेक्षाकृत एक नवीन विषय है। प्राचीन काल में राजनीति का सम्पूर्ण अध्ययन एवं चिन्तन ‘दर्शन’ (च्ीपसवेवचील) के अन्तर्गत होता था; अतः समस्त ज्ञान दर्शन की परिधि में आ जाती थीं। दर्शन के अन्तर्गत राज्य-व्यवस्था पर भी किया गया, जिसे ‘राजनीति-दर्शन’ (च्वसपजपबंस च्ीपसवेवचील) की कोटि में रखा जा सकता है। परन्तु इसके साथ-साथ आनुभविक अध्ययन की उपेक्षा होती गयी, यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है। प्लेटो अपने समय के लोकतन्त्र की जो आलोचना की, वह बहुत हद तक आनुभविकता पर आधारित थी। अरस्तू ने आदर्श राज्य-व्यवस्था की खोज में अपने समय के बीसियों संविधानों का अध्ययन करके विचार व्यक्त किया। परन्तु अनुभवमूलक अध्ययन की जितनी उन्नत तकनीक (ज्मबीदपुनम) और उपकरण (ज्ववसे) आधुनिक युग में हुआ है, वैसे पूर्व के विचारकों में नहीं पाया जाता। इसीलिए प्राचीन और मध्यकालीन विचारकों के चिंतन में दार्शनिक पद्धति की प्रधानता पायी जाती है। वैज्ञानिक पद्धति से राजनीति का अध्ययन आधुनिक युग की देन माना जाता है, जिसे ‘राजनीतिक विज्ञान’ की संज्ञा दी जाती है। प्रस्तुत शोधपत्र में राजनीति और राजनीति विज्ञान के अध्ययनों से उद्घाटित संकल्पनाओं का विश्लेषण द्वितीयक समंकों के आधार पर किया गया है।



