भारत और सार्क: एक कुटनीतिक एवं विकासीय समालोचनात्मक विवेचना - डा0 सच्चिदानन्द
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दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन के रूप में ‘सार्क’ ;ै।।त्ब्द्ध का उदय बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जियाउर्रहमान के पहल पर सन् 1985 में हुआ। यह दक्षिणी एशियाई देशों का एक ऐसा संगठन है, जो पारस्परिक सहयोग द्वारा आत्मनिर्भरता के लिए आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की नीतियों पर कार्य करता है। सार्क’ सात संस्थापक सदस्य देश हैं- बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका। वर्ष 2007 में अफगानिस्तान सार्क का 8वां सदस्य बना। सार्क सदस्यों के प्रति निष्ठा एवं घनिष्ठता को दर्शाने के लिए 26 मई, 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रथम प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में उसके राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। साथ ही, उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी प्रथम यात्रा सार्क के सदस्य देश भूटान की। इसी तरह अपने दूसरे कार्यकाल में प्रथम यात्रा मालदीव का किया। इस तरह मोदी जी ने ‘पड़ोस प्रथम’ श्लोगन को चरितार्थ करने की पहल की और सार्क सदस्यों से अपनी आत्मीय निकटता की ओर आगे बढ़े। मोदी सरकार ने व्यावहारतः वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र पहल द्वारा राष्ट्रीय हित की नीति का अनुशरण किया जाता रहा है और रणनीतिक कूटनीतिक के माध्यम से अपनी विदेश नीति को भारत ने आगे बढ़ाया है। इसी के साथ-साथ भारत की विदेश नीति विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों के साथ द्वि-पक्षीय सम्बन्धों को सुदृढ़ कर विकास के पथ पर आगे बढ़ते हुए विकसित देश के रूप में प्रतिष्ठित होना रहा है।1 प्रस्तुत शोधपत्र में इन्हीं तथ्यों के सन्दर्भ में सार्क के कुटनीतिक एवं विकासीय पक्षों का समालोचनात्मक विवेचना किया गया है।



