असहयोग आन्दोलन और हिन्दू-मुस्लिम एकता- डाॅ0 चंचल सिंह
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महात्मा गांधी के आवाह्न पर जन्मा असहयोग आन्दोलन स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रभावी अहिंसक आन्दोलन था। इससे न केवल अंग्रेज भयभीत हो गये थे, बल्कि स्वयं गांधी जी भी मंत्रमुग्ध हो गये थे। अतः उन्होंने यहाँ तक घोषणा कर दिया था कि, भारत एक वर्ष के अन्दर स्वतंत्रत हो जायेगा। महात्मा गांधी जी वे कोई भी आन्दोलन खुब सोच-विचार कर करते थे और इसके लिए एक सुनियोजित प्रयास भी करते थे। वे प्रत्येक उस सम्भावना पर मंथन करते थे, जो आन्दोलन के दौरान घटित हो सकता था। उनका चिन्तन अन्यों से अलग होता था, क्योंकि चिन्तन एवं कार्यशैली किसी स्थापित सिद्धान्त पर अधिष्ठित नहीं होकर व्यावहारिक अनुभव के अधिक निकट होता था। इससे गांधी जी के किसी भी आन्दोलन के तह तक न तो अंग्रेज पहुँच पाते थे और नहीं आमजन और नहीं नेतागण। जब तक कोई उनकी रणनीति को समझ पाये तब तक आन्दोलन उनकी पहुँच से दूर निकल जाता था। वे किसी समस्या के जड़ में जाकर चिन्तन करते और उसके समाधान हेतु छोटी-से-छोटी बातों का ख्याल रखते थे। उनकी यह कार्यशैली दक्षिण अफ्रिका में उजागर हो चुकी थी। इसके बाद भारत में ‘‘चम्पारन समस्या’’ के समाधान में भी वहीं शैली दिखी। चम्पारन आन्दोलन में गांधी जी ने अपने सिद्धान्त (सत्य एवं अहिंसा पर आधारित जानांदोलन) का अध्ययन कर इसके प्रति जनता के समर्थन एवं सहभागिता का मूल्यांकन किया, जिससे गांधी जी ने अपने को सत् प्रतिशत सही उतार पाये। इसी सूत्र को अंगीकार कर गांधी जी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर आगे बढ़े। उनके असहयोग आन्दोलन का उद्देश्य भी इसी सिद्धान्त पर अधिष्ठित था। उनके असहयोग आन्दोलन के मूल उद्देश्यों का अन्वेषण किया जाय तो ज्ञात होता है कि, वे भारत की स्वतंत्रता को ‘हिन्दू-मुस्लिम’ एकता एवं सौहार्द में देखते थे। यही कारण था कि, उन्होंने द्वैध-प्रणाली को बढ़ावा देने वाले 1909, 1919 जैसे अधिनियमों एवं खिलाफत आन्दोलन को असहयोग से सम्बद्ध कर दिया। असहयोग आन्दोलन की पृष्ठभूमि इन्हीं घटनाओं की छवि दिखती हैं।



