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नाथ सिद्धों का समाज सुधार एवं लोक संस्कृति पर प्रभाव ' कु0 वर्षा सिंह '' डाॅ0 अमित कुमार सिंह

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Zenodo2026-04-02 更新2026-05-26 收录
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सारांष नाथ पंथ भारतीय साधना के इतिहास में वह धुरी है जिसने मध्यकालीन भारत को एक नई दिशा दी। नाथ संप्रदाय के सिद्धों और योगियों ने भारतीय जनमानस के हृदय मे वह बीज बोया जो आगे चलकर संत साहित्य के रूप में पुष्पित हुआ। भारतीय धर्म साधना के इतिहास मे सिद्ध और नाथ परंपराएँ एक क्रांतिकारी मोड़ के रूप में उभरती हैं। आठवीं शताब्दी से लेकर चैदहवीं शताब्दी तक का कालखण्ड इन संतो के प्रभाव का स्वर्ण काल था। सिद्धों की संख्या 84 और नाथों की 9 मानी गयी है। जहाँ सिद्धों ने बौद्ध धर्म के ‘वज्रयान’ तत्व को लेकर ‘सहज यान’ की स्थापना की, वहीं नाथो ने शैव मत और योग को आधार बनाकर समाज को नई दिशा दी। इनका मुख्य उद्देश्य केवल अध्यात्मिक मुक्ति नहीं, बल्कि तत्कालीन जड़ समाज को गतिशीलता प्रदान करना था। इन्होंने समाज के निचले तबके को साथ लेकर आध्यात्मिक चेतना जगाई। नाथ सिद्ध केवल एक धार्मिक पंथ के अनुयायी नहीं थे, बल्कि वे मध्यकालीन भारत के प्रथम क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। जब मध्ययुगीन भारत पर संकट के बादल छाये हुए थे तब यह पंथ आशा की किरण बनकर उभरा, पूजा-पाठ व तंत्र-मंत्र की रूढ़िवादी पाखण्डी धारणा का प्रवाह प्रबल होता जा रहा था। इस तामसिक पूजा पद्धति के विरोध में एक ऐसे सम्प्रदाय का उद्भव हुआ जो सहज सरल व समरस था। नाथ पंथ अपने अर्विभाव काल से लेकर अद्यतन भारत के समाजिक धार्मिक व अध्यात्मिक जीवन को अपने प्रकृति से प्रज्वलित किये हुए है। प्रस्तुत शोध पत्र में इन संतो द्वारा जाति-पाति के खण्डन, बाह्याडंबरांे के विरोध व लोक भाषा के माध्यम से संस्कृति का संरक्षण व विश्लेषण किया गया है।

创建时间:
2026-04-02
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