चित्रा मुद्गल के उपन्यासों में वर्णित नारी जीवन -अमित पटेल
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हिन्दी कथा साहित्य जगत् में चित्रा मुद्गल का साहित्य अपनी एक अलग पहचान रखता है। नारी जागरण उनके लेखन का प्रिय विषय रहा है और यही कारण है कि उन्होंने अपने कथा साहित्य में मुख्य रूप से नारी जीवन की त्रासदी और संघर्षशीलता को चित्रित किया है। उनका व्यक्तित्व एक भारतीय नारी की गरिमा से परिपूर्ण है तथा लेखन के स्तर पर वह उतनी ही जागरूक, चेतनायुक्त एवं मुखर हैं। उन्होंने संवेदनाओं, मानवीय मूल्यों और नारी की दशा और दिशा से संबंधित विभिन्न पहलुओं को अपनी सूक्ष्मदृष्टि और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति प्रदान की है। पितृसत्तात्मक समाज में नारी को प्रेरणास्रोत, पालन-पोषण की उत्तरदायिनी, उन्नयन का आधार, संचायिका आदि के रूप में न मानकर उन्हें दबी, कुचली और उपभोग की वस्तु माना जाने लगा। किन्तु समकालीन परिवेश में शिक्षा-दीक्षा एवं विदेशी सभ्यता का प्रभाव आदि द्वारा नारी सजग हो गयी और अपनी अस्मिता के लिए लड़ने लगी। नारी को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना चित्रा जी का लक्ष्य है। वास्तव में वे नारीवादी नहीं हैं, किन्तु मानवतावादी होने के कारण अपनी रचनाओं में नारी की पीड़ाओं का चित्रण करती हैं।



