राजेन्द्र यादव के कथा साहित्य में स्त्री विमर्श ...... *.कुलदीप कुमार
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साहित्य समाज का खुला दस्तावेज है जो समाज के मनोभावो की झांकी प्रस्तुत करता है। समाज में जनतांत्रिक मूल्यों की स्थापना साहित्य का मुख्य उद्देश्य है। समाज के प्रति प्रतिबद्ध हर रचनाकार अपनी रचना के अन्तर्गत मूल्यों को प्रतिष्ठित करता है। आज दुनिया की आधी आबादी स्त्री अपने अधिकारों के प्रति सजग एवं सचेत हो चुकी है। वह सदियों से स्वतंत्र जीवन जीने से वंचित रही है। स्त्री विमर्श स्त्री जीवन के अनकहे-अनछुए यथार्थ का अध्ययन ही है। समाज में स्वतंत्रता, समानता, भाईचार जैसे मूल्यों को पुनः स्थापित करते हुये स्त्री विमर्श स्त्री को वस्तु से मनुष्य का दर्जा दिलाने की दिशा में पहल करता है। समाज के मुखौटे को बनकाब करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हिन्दी में सन् 1960 से स्त्री जीवन को केन्द्र में रखकर अनेक उपन्यास रचे गये है। स्त्री विमर्श की खासियत स्त्री द्वारा खुद को दूसरों के नजरिए से नही बल्कि खुद के नजरिए से देखने-परखने का कार्य किया जा रहा है। समाज द्वारा सदियों से स्त्री को गुलाम बनाये रखने की साजिशों का पर्दाफाश किया जा रहा है। स्त्री विमर्श का मूल स्वर प्रतिशोध का नहीं प्रतिरोध का है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में स्त्री की भूमिका को अहम् बनाने का प्रयास करने वाले लेखक राजेन्द्र यादव और उनके साहित्य का विशेष महत्व है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में एवरेस्ट पर विजय पाना आसान है, लेकिन सामाजिक रूढ़ियों और असमानता के संस्कारों से पार पाना सम्भव नहीं है, क्योकिं एवरेस्ट शिखर एक बार में चढ़ा जा सकता है गैर-बराबरी को खंदको से तो हर रोज गुजरना होता है अगर किसी दिन यह सुनाई पड़े कि हिन्दू समाज में औरत होने के अपराध में आत्महत्या कर ली या से जला दिया गया तो किसी को की आश्चर्य नही होगा समाज में तो ऐसा होता ही रहता है।"



