नागार्जुन के उपन्यास में ग्रामीण संस्कृति: 'वरुण के बेटे' के संदर्भ में - पुष्पा मौर्या
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बहुमुखी प्रतिभा के धनी नागार्जुन जी गाँव में ही पले बढ़े थे, इसलिए ग्रामीण संस्कृति से इनका विशेष लगाव था। नागार्जुन स्वयं को जनकवि कहते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में भी सामाजिक, राजनीतिक अन्याय और ग्रामीण जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया है। ‘वरुण के बेटे’ उपन्यास में भी नागार्जुन ने ग्रामीण संस्कृति का यथार्थ चित्रण किया है। ‘वरुण के बेटे’ नागार्जुन का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है, इसमें ग्रामीण जीवन की झलक ग्रामीण संस्कृति, ग्रामीण लोगों का आचार, व्यवहार, संघर्ष तथा लोकजीवन की गंध स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। यह उपन्यास केवल उपन्यास नहीं है बल्कि भारतीय ग्रामीण अंचल की संस्.ति और सामाजिक ताने-बाने का यथार्थ चित्रण है।
创建时间:
2026-03-24



