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प्राचीनकालीन भारतीय समाज में महिला षिक्षा- सुमित कुमार ओझा

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Zenodo2026-03-17 更新2026-05-26 收录
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महिला शिक्षा किसी भी समाज के विकास का मुख्य मानक स्वीकार किया जाता है। किसी समाज के विकसित तथा सभ्य होने में वहां की महिलाओं का सुशिक्षित और सुसंस्कृत होना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि एक महिला का अपने घर-परिवार से लेकर समाज के प्रति बहुत सारी जिम्मेदारियाँ होती हैं। कहा भी गया है कि, यदि एक महिला शिक्षित होती है, तब एक परिवार, एक पीढ़ी और एक समाज शिक्षित होता है। इस मंत्र को वैदिक काल में पूर्ण मान्यता प्राप्त थी और यही कारण था कि उस काल में महिला-पुरुष को समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था। महिलाओं से ही उस काल में श्रेष्ठ उद्दात और महान् विचारों का प्रस्फुटन हुआ, जिनको ऋग्वेद की ऋचाओं में स्थान दिया गया। प्रस्तुत शोधपत्र में महिला शिक्षा में उन्हीं उपलब्धियों एवं देन को रेखांकित करते हुए वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता का अन्वेषण किया गया है।

女性教育被公认为衡量任何社会发展的核心标尺。一个社会要实现发达与文明,其女性接受良好教育、具备优良素养乃是必要前提,盖因女性从家庭、家族直至整个社会,均肩负着多重责任。有言曰:若女性受教育,则一个家庭、一代人与整个社会皆可获教化。这一理念在吠陀时代便已获得完全认可,也正因如此,彼时男女两性均享有平等接受教育的权利。当时卓越的思想与伟大的理念正是由女性所催生,并被收录于《梨俱吠陀》(Rigveda)的赞歌之中。本研究论文旨在梳理女性教育领域的上述成就与贡献,并探讨其在当代的现实意义。

创建时间:
2026-03-17
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